दानी भए नए माँगत

Raskhan

दानी भए नए माँगत दान सुनै जु पै कंस तौ बाँधि के जैहो ।
रोकत हौ बन मैं रसखानि पसारत हाथ घनी दुख पैहो ॥
टूटै छरा वछरा दिक गोधन जो धन है सु सबै धन दैहो ।
जैहै अभूषन काहू सखी को तो मोल छला के लला न बिकैहो ॥९०॥