दृग दूने खिंचे रहैं
दृग दूने खिंचे रहैं कानन लौं लट* आनन पै लहराय रही ।
छक* छैल छबीली* छटा छहराय कै कौतुक कोटि दिखाय रही ॥
झुक झूम झमाकन चूम अमी चहि चाँदनी चंद चुराय रही ।
मन भाय रही रसखानि महा लखि* मोहन को तरसाय रही ॥१३२॥
दृग दूने खिंचे रहैं कानन लौं लट* आनन पै लहराय रही ।
छक* छैल छबीली* छटा छहराय कै कौतुक कोटि दिखाय रही ॥
झुक झूम झमाकन चूम अमी चहि चाँदनी चंद चुराय रही ।
मन भाय रही रसखानि महा लखि* मोहन को तरसाय रही ॥१३२॥