देखत सेज विछी ही

Raskhan

देखत सेज विछी ही अछी विष सौं भिदगौ सगरे सगरे तन ।
ऐसी अचेत मिरी नहि चेत उपाड़ करें सगरी सजनी-गन ।
बोली सयानी सी रसखानि बचें यों सुनाइ कह्यौ जुवती-जन ।
देखन कौं चलियै री चलौ सब रास रच्यौ मनमोहन जू बन ॥२४७॥