देखन कौं सखी नैन

Raskhan

देखन कौं सखी नैन भए न सने तन आवत गाइन पाछैं ।
कान भए इन बातन के सुनिबे कों अमोनिधि बोलन आछैं ॥
पै सजनी न सम्हारि परै वह बाँकी बिलोकन कोर कटाछैं* ।
भूलि गयो न हियो मेरी आली जहाँ पिय खेलत काछिनी काछैं ॥२८॥

खंजन नैन फँसे पिंजरा छवि नाहि रहै थिर कैसहूं माई ।
छूटि गई कुलकानि* सखी रसखानि लखी मुसिकानि सुहाई ॥
चित्र कढ़े से रहैं मेरे नैन न बैन कढ़ै मुख दीनी दुहाई ।
कैसी करौं जिन जाव अली सब बोलि उठैं यह बावरी आई ॥२९॥