दोउ कानन कुण्डल मोरपखा
दोउ कानन कुण्डल मोरपखा सिर सोहै दुकूल* नयो चटको ।
मनिहार* गरे सुकुमार धरे नट भेस अरे पिय को टटको ॥
सुभ काछनी बैजनी पैंजनी पामन आमन मै न लगै झटको ।
वह सुन्दर को रसखानि अली जु गलीन मैं आइ अबै अँटको ॥३३॥
दोउ कानन कुण्डल मोरपखा सिर सोहै दुकूल* नयो चटको ।
मनिहार* गरे सुकुमार धरे नट भेस अरे पिय को टटको ॥
सुभ काछनी बैजनी पैंजनी पामन आमन मै न लगै झटको ।
वह सुन्दर को रसखानि अली जु गलीन मैं आइ अबै अँटको ॥३३॥