द्रौपदी औ गनिका गज
द्रौपदी औ गनिका गज गीध अजामिल सों कियो सो न निहारो ।
गौतम गेहिनी कैसी तरी प्रहलाद को कैसे हर्यो दुख भारो ॥
काहे कों सोच करै रसखानि कहा करिहैं रविनन्द विचारो ।
ता खन जा खन राखिए माखन चाखनहारो सो राखनहारो ॥१०६॥
द्रौपदी औ गनिका गज गीध अजामिल सों कियो सो न निहारो ।
गौतम गेहिनी कैसी तरी प्रहलाद को कैसे हर्यो दुख भारो ॥
काहे कों सोच करै रसखानि कहा करिहैं रविनन्द विचारो ।
ता खन जा खन राखिए माखन चाखनहारो सो राखनहारो ॥१०६॥