नवरंग अनंग भरी छबि
नवरंग अनंग भरी छबि सों वह मूरत आँखि गड़ी ही रहै ।
बतियाँ तन की मन ही में रहैं छतियाँ* उर बीच अड़ी ही रहै ॥
तबहूँ रसखान सुजान अली नलिनी दल बूँद पड़ी ही रहै ।
जिय की नहिं जानत हौं सजनी रजनी अँसुवान लड़ी ही रहै ॥१३५॥
नवरंग अनंग भरी छबि सों वह मूरत आँखि गड़ी ही रहै ।
बतियाँ तन की मन ही में रहैं छतियाँ* उर बीच अड़ी ही रहै ॥
तबहूँ रसखान सुजान अली नलिनी दल बूँद पड़ी ही रहै ।
जिय की नहिं जानत हौं सजनी रजनी अँसुवान लड़ी ही रहै ॥१३५॥