नागर छैलहि गोकुल मैं

Raskhan

नागर छैलहि गोकुल मैं मग रोकत संग सखा ढिग तैं ।
जाहि न ताहि दिखावत आँखि सु कौन गई अब तोसों करें ॥
हाँसी मैं हार हर्यो रसखानि जू जो कहूँ नैकु तगा टुटि जैहैं ।
एकही मोती के मोल लला सिगरे ब्रज हाटहि हाट बिकैहैं ॥८९॥