पिय सों तुम मान
पिय सों तुम मान कर्यौ कत नागरि आजु कहा किनहूँ सिख दीनी ।
ऐसे मनोहर प्रीतम के तरुनी वरुनी* पग पोछें नवीनी ॥
सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख नैननि चैन महारस भीनी ।
रसखानि न लागत तोहि कछू अब तेरी तिया किनहूँ मति दीनी ॥२२१॥
पिय सों तुम मान कर्यौ कत नागरि आजु कहा किनहूँ सिख दीनी ।
ऐसे मनोहर प्रीतम के तरुनी वरुनी* पग पोछें नवीनी ॥
सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख नैननि चैन महारस भीनी ।
रसखानि न लागत तोहि कछू अब तेरी तिया किनहूँ मति दीनी ॥२२१॥