प्यारी के चारु सिंगारु

Raskhan

प्यारी के चारु सिंगारु तरंगनि जाइ लगी रत्ति की दुति कूलनि ।
जोवन जेब कहा कहिए उपजौ छवि मंजु अनेक दुकूलनि ।
कंचुकी सेत में जावक विन्दु विलोकि मरें मधवानि* की सूलनि ।
पूजे है आजु मनौ रसखानि सु भूत के भूप बँधूक के फूलनि ॥२५५॥