प्रेम पगे जू रँगे
प्रेम पगे जू रँगे रँग साँवरे मानौं मनाये न लालची नैना ।
धावत हैं उत ही जित मोहन रोके रुकैं नहीं घूँघट ऐना* ॥
कानन लौं कल* नाहि परै सखि प्रीति में भीजे सुने मृदु बैना ।
रसखान भई मधु की मखियाँ अब नेह को बंधन क्यों हूँ छुटै ना ॥१३४॥
प्रेम पगे जू रँगे रँग साँवरे मानौं मनाये न लालची नैना ।
धावत हैं उत ही जित मोहन रोके रुकैं नहीं घूँघट ऐना* ॥
कानन लौं कल* नाहि परै सखि प्रीति में भीजे सुने मृदु बैना ।
रसखान भई मधु की मखियाँ अब नेह को बंधन क्यों हूँ छुटै ना ॥१३४॥