प्रेम मरोरि उठै तत्र

Raskhan

प्रेम मरोरि उठै तत्र हीं मन पाग मरोरनि में उरझावै ।
रूसे से* ह्वै दृग मोसों रहें लखि मोहन मूरति मो पै न आवै ॥
बोले विना नहिं चैन परै रसखानि सुने कल सौनन पावै ।
भौंह मरोरिबो री रुसिबो झुकिबो पिय सों सजनी सिखरावै ॥२११॥