फागुन लाग्यो सखी जब
फागुन लाग्यो सखी जब तें तब तें ब्रजमंडल धूम मच्यो है ।
नारि नवेली बचैं नहि एक बिसेख यहै सबै प्रेम अच्यो है ॥
साँझ सकारे वही रसखानि सुरंग गुलाल लै खेल रच्यो है ।
को सजनी निलजी* न भई अरु कौन भटू जिहि मान बच्यो है ॥१२५॥
फागुन लाग्यो सखी जब तें तब तें ब्रजमंडल धूम मच्यो है ।
नारि नवेली बचैं नहि एक बिसेख यहै सबै प्रेम अच्यो है ॥
साँझ सकारे वही रसखानि सुरंग गुलाल लै खेल रच्यो है ।
को सजनी निलजी* न भई अरु कौन भटू जिहि मान बच्यो है ॥१२५॥