बंसी बजावत आनि कढ़ो

Raskhan

बंसी बजावत आनि कढ़ो सो गली में अली कछू टोना सों डारैं ।
हेरि चितै तिरछी करि दृष्टि चलो गयो मोहन मूठि सी मारैं ॥
ताही घरी सों परी घरी सेज पै प्यारी न बोलति प्रानहूँ वारैं ।
राधिका जीहै तौ जीहैं सबै न तौ पीहैं हलाहल नन्द के द्वारैं ॥११॥