बाँकी धरें कलगी सिर
बाँकी धरें कलगी सिर ऊपर वाँसुरी-तान कटै रस बीर के ।
कुण्डल कान लसैं रसखानि विलोकन तीर अनंग तुनोर के ॥
डारि ठगौरी गयौ चित चोरि लिए हैं सब सुख सोखि सरीर के ।
जात चलावन मो अवला यह कौन कला है भला वे अहीर के ॥१८०॥
बाँकी धरें कलगी सिर ऊपर वाँसुरी-तान कटै रस बीर के ।
कुण्डल कान लसैं रसखानि विलोकन तीर अनंग तुनोर के ॥
डारि ठगौरी गयौ चित चोरि लिए हैं सब सुख सोखि सरीर के ।
जात चलावन मो अवला यह कौन कला है भला वे अहीर के ॥१८०॥