बाँकी मरोर गही भृकुटीन

Raskhan

बाँकी मरोर गही भृकुटीन लगी अँखियाँ तिरछान तिया की ।
टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिनि तैं दुति दूनी हिया की ।
सोहूँ तरंग अनंग की अँगनि ओप उरोज उठी छतिया की ।
जोवन जोति सु यों दमकैं उसकाइ दई मनो बाती दिया की ॥२४६॥