बागन काहे को जाओ

Raskhan

बागन काहे को जाओ पिया घर बैठेही बाग लगाय दिखाऊँ ।
एड़ी अनार सी मौर रही बहियाँ दोउ चंपे सी डार नवाऊँ ॥
छातिन में रस के निबुआ अरु घूंघट खोलि कै दाख चखाऊँ ।
टांगन के रसके चसके रति फूलनि की रसखानि लुटाऊँ ॥१६॥