बिहरें पिय प्यारी सनेह

Raskhan

बिहरें पिय प्यारी सनेह सने छहरें चुनरी के झना झहरें ।
सिहरें नवजोवन रंग अनंग सुभंग अपांगनि की गहरें ॥
बहरें रसखानि नदी रस की घहरें बनिता कुलहू भहरें ।
कहरें बिरहीजन आतप सों लहरें लली लाल लिए पहरें ॥९२॥