ब्रज की वनिता सव

Raskhan

ब्रज की वनिता सव घेरि कहैं, तेरौ ढारो* विगारो कहा कस री ।
अरी हमको जम काल* भई नेकु कान्ह गही तौ कहा रस री ॥
रसखानि भली विधि अनि वनी वसिवो नहीं देत दिना दस री ।
हम तो व्रज को वसिवोई तजौ वस री व्रज बैरिन तू बँसरी ॥१८८॥