भौंह भरी वरुनी सुथरी

Raskhan

भौंह भरी वरुनी सुथरी अतिसै अधरानि रँगी रंग रातो ।
कुण्डल लोल कपोल महाछबि कुंजनि तैं निकस्यो मुसिकातो ॥
रसखानि लखै मग छूटि गयो डग भूलि गई तन की सुधि सातो ।
फूटि गयो दधि को सिर भाजन टूटिगो नैननि लाज को नातो ॥२२॥