मग हैरत धूँधरे नैन

Raskhan

मग हैरत धूँधरे नैन भए रसना रट वा गुन गावन की ।
अँगुरी गनि हार थकी सजनी सगुनौती* चलै नहि पावन की ।
पथिको कोउ ऐसो जु नाहि कहै सुधि है रसखान के आवन की ।
मनभावन आवन सावन में कही औधि करी डग वावन की ॥२३१॥