मान की औधि है
मान की औधि है आधी घरी अरु जौ रसखान डरै डरके’ डर ।
तोरिये नेह न छोड़िये पाँ परों ऐसे कटाच्छ महा हियरा हर ॥
लाल गुपाल को हाल विलोकि री नेंक छुवै किन दै करसों कर ।
ना कहिबे पर वारति प्रान कहा लख वारि है हाँ कहिबे पर ॥१४९॥
मान की औधि है आधी घरी अरु जौ रसखान डरै डरके’ डर ।
तोरिये नेह न छोड़िये पाँ परों ऐसे कटाच्छ महा हियरा हर ॥
लाल गुपाल को हाल विलोकि री नेंक छुवै किन दै करसों कर ।
ना कहिबे पर वारति प्रान कहा लख वारि है हाँ कहिबे पर ॥१४९॥