मेजं मनोहर मूरि लखै

Raskhan

मेजं मनोहर मूरि लखै तबहीं सबहीं पतहीं* तज दीनी ।
प्रान पखेरू परे तलफैं वह रूप के जाल में आस अधीनी ॥
आँख सों आँख लड़ी जबहीं तब सें ये रहें अँसुवा रंगभीनी ।
या रसखानि अधीन भई सब गोपाल की तजि लाज नवीनी ॥१४॥