मेरो सुभाव चितैवे कों

Raskhan

मेरो सुभाव चितैवे कों माइ रो लाल निहारि कै बंसी बजाई ।
वा दिन तें मोहि लागी ठगौरी सी लोग कहें कोई बावरी आई ॥
यों रसखानि घिरयो सिगरो ब्रज जानत वे कि मेरो जियराई ।
जो कोउ चाहै भली अपनों ती सनेह न काह सों कीजियो माई ॥७९॥