मैं रसखान की खेलनि

Raskhan

मैं रसखान की खेलनि जोति कै मालती मालती माल लई री ।
मेरीये जानि के सूधि सबै चुप ह्वै रही काहु करी न खई* री ॥
भावते स्वेद की वास सखी ननदी पहिचानिं प्रचंड भई री ।
मैं लिखियौ लिखि कै अँखियाँ मुसकाय लचाय नचाय दई री ॥२०५॥