मोतिन माल वनी लटकैं
मोतिन माल वनी लटकैं लटकी लट औ लट घूँघरवारी ।
अँगनि अँग जराइ कसै धरु सीस लसै पगिया जरतारी ।
पूरब पूरे ही पुन्यन तैं रसखानि जो मूरति आनि निहारी ।
चारयौ दिसा के महा अघ हाँके झराँखा तैं झाँके हैं वाँकेविहारी ॥२४३॥
मोतिन माल वनी लटकैं लटकी लट औ लट घूँघरवारी ।
अँगनि अँग जराइ कसै धरु सीस लसै पगिया जरतारी ।
पूरब पूरे ही पुन्यन तैं रसखानि जो मूरति आनि निहारी ।
चारयौ दिसा के महा अघ हाँके झराँखा तैं झाँके हैं वाँकेविहारी ॥२४३॥