मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं

Raskhan

मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं गुंज की माल गरें पहिरौंगी ।
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी ॥
भावतो वोहि’ मेरो रसखानि सों तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी ।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी ॥३॥