मोरपखा सिर काननि कुंडल
मोरपखा सिर काननि कुंडल कुंतल सो छवि गंडन छाई ।
बंक विसाल रसाल विलोचन मोहन हैं दुखमोचन माई ।
आली नवीन महा घन सौतन पीत पटा ज्यों छटा कल छाई ।
हौं रसखान जकी सी रही कछु टौनों चलाइ ठगोरी सी लाई ॥२५२॥
मोरपखा सिर काननि कुंडल कुंतल सो छवि गंडन छाई ।
बंक विसाल रसाल विलोचन मोहन हैं दुखमोचन माई ।
आली नवीन महा घन सौतन पीत पटा ज्यों छटा कल छाई ।
हौं रसखान जकी सी रही कछु टौनों चलाइ ठगोरी सी लाई ॥२५२॥