मोर के चंदन मौर
मोर के चंदन मौर बन्यौ दिन दूलह है अली नन्द को नंदन ।
श्रीवृषभानुसुता दुलही दित्त जोरी बनी विधना सुखकंदन ॥
रसखानि न आवत मो पै कह्यो कछु दोऊ फँसे छवि प्रेम के फंदन ।
जाहि बिलोकै सबै सुख पावत ये ब्रजजीवन हैं दुखदंद न ॥८३॥
मोर के चंदन मौर बन्यौ दिन दूलह है अली नन्द को नंदन ।
श्रीवृषभानुसुता दुलही दित्त जोरी बनी विधना सुखकंदन ॥
रसखानि न आवत मो पै कह्यो कछु दोऊ फँसे छवि प्रेम के फंदन ।
जाहि बिलोकै सबै सुख पावत ये ब्रजजीवन हैं दुखदंद न ॥८३॥