मोहन के मन की
मोहन के मन की सव जानत जोहन के मग मोहि लियौ मन ।
मोहन सुंदर आनन चंद तैं कुंजनि देख्यौ मैं स्याम सिरोमन ।
ता दिन तैं मेरे नैननि लाज तजी कुलकानि की डोलति हाँ वन ।
कैसी करौं रसखानि लगी जकरी पकरी पिय के हित कौ पन ॥२४८॥
मोहन के मन की सव जानत जोहन के मग मोहि लियौ मन ।
मोहन सुंदर आनन चंद तैं कुंजनि देख्यौ मैं स्याम सिरोमन ।
ता दिन तैं मेरे नैननि लाज तजी कुलकानि की डोलति हाँ वन ।
कैसी करौं रसखानि लगी जकरी पकरी पिय के हित कौ पन ॥२४८॥