मोहन के मन भाइ
मोहन के मन भाइ गयो इक भाइ सो ग्वालिन गोधन गायो ।
तातें लग्यो चट चौहट सों हरवाइ दै गात सों गात छुवायो ॥
रसखानि लही इक चातुरता चुपचाप रही जब लौं घर आयो ।
नैन नचाइ चितै मुसिकाइ सु ओट ह्वै जाइ अँगूठा दिखायो ॥८८॥
मोहन के मन भाइ गयो इक भाइ सो ग्वालिन गोधन गायो ।
तातें लग्यो चट चौहट सों हरवाइ दै गात सों गात छुवायो ॥
रसखानि लही इक चातुरता चुपचाप रही जब लौं घर आयो ।
नैन नचाइ चितै मुसिकाइ सु ओट ह्वै जाइ अँगूठा दिखायो ॥८८॥