मोहन जू के वियोग

Raskhan

मोहन जू के वियोग की ताप मलीन महा द्युति* देह तिया की ।
पंकज सो मुख गो मुरझाय लगें लपटें विरहाग्नि हिया की ॥
ऐसे में आवत कान्ह सुने रसखान सु तनी तरकी अँधिया की ।
यों जगि जोति उठी तनकी उसकाय दई* मनों बाती दिया की ॥१४२॥