मोहिनी मोहन सों रसखानि
मोहिनी मोहन सों रसखानि अचानक भेंट भई वन माहीं ।
जेठ की घाम भई सुखधाम अनंद ही अंग ही अंग समाहीं ।
जीवन को फल पायौ भटू रस-बातन केलि सों तोरत नाहीं ।
कान्ह को हाथ कँधा पर है मुख ऊपर मोर किरीट की छाहीं ॥१५९॥
मोहिनी मोहन सों रसखानि अचानक भेंट भई वन माहीं ।
जेठ की घाम भई सुखधाम अनंद ही अंग ही अंग समाहीं ।
जीवन को फल पायौ भटू रस-बातन केलि सों तोरत नाहीं ।
कान्ह को हाथ कँधा पर है मुख ऊपर मोर किरीट की छाहीं ॥१५९॥