मो मन मोहन कों

Raskhan

मो मन मोहन कों मिलि कै सबहीं मुसकानि दिखाय दई ।
वह मोहनी मूरति रूपमयी सबही चितई तब हौं चितई ॥
उन तौ अपने अपने घर की रसखानि भली बिधि राह लई ।
कछु मोहि का पाप पर्यो पल मैं पग पावत पौरि पहार भई’ ॥७८॥