यह गोधन* गावत गोधन
यह गोधन* गावत गोधन में जब ते यह मारग है निकस्यो ।
तबते कुलकानि किंती यो करों नहीं मानत पापी हियौ हुलस्यो ॥
अब तो जु भई सु भई कह होत है लोग अजान हँस्यो सु हँस्यो ।
कोऊ पौर न जानत जानत सो जिहिके हिय में रसखान वस्यो ॥१३८॥
यह गोधन* गावत गोधन में जब ते यह मारग है निकस्यो ।
तबते कुलकानि किंती यो करों नहीं मानत पापी हियौ हुलस्यो ॥
अब तो जु भई सु भई कह होत है लोग अजान हँस्यो सु हँस्यो ।
कोऊ पौर न जानत जानत सो जिहिके हिय में रसखान वस्यो ॥१३८॥