रसखानि सुन्यो है वियोग
रसखानि सुन्यो है वियोग के ताप मलीन महा दुति देह तिया की ।
चन्द्रमुखी तन गो मुरझाइ लगी लपटैं बिस स्वाँस हिया की ॥
ऐते मैं आवत कन्हाई के हुलसे सरके तरकी अँगियाँ की ।
यों जग जोति उठी तन की उसकाइ दई मनौ बाती दिया की ॥१००॥
रसखानि सुन्यो है वियोग के ताप मलीन महा दुति देह तिया की ।
चन्द्रमुखी तन गो मुरझाइ लगी लपटैं बिस स्वाँस हिया की ॥
ऐते मैं आवत कन्हाई के हुलसे सरके तरकी अँगियाँ की ।
यों जग जोति उठी तन की उसकाइ दई मनौ बाती दिया की ॥१००॥