लाय समाधि रहे वरम्हादिक
लाय समाधि रहे वरम्हादिक जोगी भये पर अन्त न पावें ।
साँझ ते भोरहि भोर ते साँझनि सेस सदा नित नाम जपावें ।
ढूँढ़े फिरे तिरलोक में साख सुनारद लै कर बीन बजावें ।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पै नाच नचावें ॥१५२॥
लाय समाधि रहे वरम्हादिक जोगी भये पर अन्त न पावें ।
साँझ ते भोरहि भोर ते साँझनि सेस सदा नित नाम जपावें ।
ढूँढ़े फिरे तिरलोक में साख सुनारद लै कर बीन बजावें ।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पै नाच नचावें ॥१५२॥