लाल लसै पगिया सबके
लाल लसै पगिया सबके सबके पट कोटि सुगंधवि भीने ।
अंगनि अंग सजे सब ही रसखानि जराउ नवीने ।
मुकता गलमाल लसै सब के सब ग्वार कुवार सिंगार सो कीने ।
पैं सिगरे व्रज के हरि ही हरि ही कै हरें हियरा हरि लोने ॥१६४॥
लाल लसै पगिया सबके सबके पट कोटि सुगंधवि भीने ।
अंगनि अंग सजे सब ही रसखानि जराउ नवीने ।
मुकता गलमाल लसै सब के सब ग्वार कुवार सिंगार सो कीने ।
पैं सिगरे व्रज के हरि ही हरि ही कै हरें हियरा हरि लोने ॥१६४॥