लीने अबीर भरे पिचका
लीने अबीर भरे पिचका रसखानि खरो बहु भाय भरो जू ।
मार से गोप कुमार कुमार से देखत ध्यान टरो न टरो जू ॥
पूरब पुन्यनि हाथ पर्यौ तुम राज करौ उठि काज करो जू ।
ताहि सरी लखि लाख जरी इहि पाख पतिब्रत ताख धरो जू ॥१२१॥
लीने अबीर भरे पिचका रसखानि खरो बहु भाय भरो जू ।
मार से गोप कुमार कुमार से देखत ध्यान टरो न टरो जू ॥
पूरब पुन्यनि हाथ पर्यौ तुम राज करौ उठि काज करो जू ।
ताहि सरी लखि लाख जरी इहि पाख पतिब्रत ताख धरो जू ॥१२१॥