लोक की लाज तजी

Raskhan

लोक की लाज तजी तबहीं जब देख्यो सखी ब्रजचन्द सलोनो ।
खंजन मीन सरोजन की छबि गंजन नैन लला दिनहोनो ॥
रसखानि निहारि सकैं जु सम्हारि कै को तिय है वह रूप सुठोनो ।
भौंह कमान सों (जोहन) कों सब बेधत प्राननि नन्द को छोनो ॥१३॥