वह साँवरों नंद' को

Raskhan

वह साँवरों नंद’ को छैल अली अब तो अति ही इतरान लग्यौ ।
नित घाटन बाटन कुंजन में मोहिं देखत ही नियरान लग्यौ ॥
रसखान बखान कहा कहिए तकि सैननि सो मुसकान लग्यौ ।
तिरछी बरछी सम मारत है दृग वान कमान सु कान लग्यौ ॥१४७॥