वागन में मुरली रसखान

Raskhan

वागन में मुरली रसखान सुनि सुनिकै जिय रीझ पचैगो ।
धीर समीर को नीर भरौं नहि माइ झकै* औ बवा सकुचैगो ॥
आली दुरैधै* को चोटनि नेम कहौ अब कौन उपाय बचैगो ।
जागवौ भाँति कहाँ घर सों परसों वह रास परोस रचैगो ॥२१२॥