वात चलै चमकै दुति
वात चलै चमकै दुति दीपत चंचित चंचिलता चिनगारी ।
लोचन बंक विलोकनि लोलनि बोलनि मैं वतिया रसकारी ।
सौंहूँ तरंग अनंग की अँगनि कोमल यों सुमुकी सनकारी ।
पूतरी खोलत ही पट की रसखानि सु चौपरि खेलत प्यारी ॥२४९॥
वात चलै चमकै दुति दीपत चंचित चंचिलता चिनगारी ।
लोचन बंक विलोकनि लोलनि बोलनि मैं वतिया रसकारी ।
सौंहूँ तरंग अनंग की अँगनि कोमल यों सुमुकी सनकारी ।
पूतरी खोलत ही पट की रसखानि सु चौपरि खेलत प्यारी ॥२४९॥