वात सुनी न कहूँ

Raskhan

वात सुनी न कहूँ हरि की, न कहूँ हरि सों मुख बोल हँसी है ।
काल्हि ही गोरस बेचन कौं निकसी व्रजवासिनि बीच लसी है ॥
आजु ही वारक ‘लेहु दही’ कहि कै कछु नैनन मैं विहँसी है ।
बैरिनि वाहि भई मुसकानि जु वा रसखानि के प्रान वसी है ॥२०७॥