वारति* जा पर ज्यों

Raskhan

वारति* जा पर ज्यों न थकें चहूँ ओर जितो नृपती धरती है ।
मान सकें धरती सों कहाँ जिहि रूप लखै रती सी रती है ॥
जा रसखान विलोकन काज सदाहूँ सदा हरती बरती है ।
तौ लगि ता मन मोहन की अँखियाँ निसि द्यौस हहा करती है ॥२२०॥