वा रसखानि गुनों* सुनि

Raskhan

वा रसखानि गुनों* सुनि के हियरा सत टूक ह्वै फाटि गयौ है ।
जानति हैं न कछू हम हयाँ उन वाँ पढ़ि मंत्र कहा धौं दयौ है ।
साँची कहूँ जिय मैं निज जानि के जानति हैं जस जैसो लयौ है ।
लोग लुगाई सबै व्रज माँहि कहूँ हरि चेरी को* चेरो भयौ है ॥२३२॥