वृषभान के गेह दिवारी

Raskhan

वृषभान के गेह दिवारी के द्यौस अहीर अहीरनि भीर भई ।
जितही तितही धुनि गोधन की सब ही व्रज ह्वै रह्यो राम भई ॥
रसखान तवै हरि राधिका यों कछु सैननि ही रस वेल वई ।
उहि अंजन आँखिन आँज्यौ भटू इन कुंकुम आड़* लिलार* दई ॥२०६॥