शंकर से सुर जाहि

Raskhan

शंकर से सुर जाहि भजैं चतुरानन ध्यान में धर्म बढ़ावैं ।
नेक हिये में जो आवतही महाजड़ मूढ़ रसखान कहावैं ॥
जा पर सुन्दर देवबधू नहिं वारत प्रान अवार लगावैं’ ।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं ॥३२॥