श्रीमुख यों न बखान
श्रीमुख यों न बखान सके वृषभान-सुता जू को रूप उजारी ।
है रसखानि तू ज्ञान सँभारत नैन निहार जु रीझनहारी ।
चारु सिंदूर को लाल रसाल लसै व्रजवाल को भाल टिकारी ।
गोद में मानो विराजतु है घनश्याम के सारे कौ सारे कौ सारी ॥२६०॥
श्रीमुख यों न बखान सके वृषभान-सुता जू को रूप उजारी ।
है रसखानि तू ज्ञान सँभारत नैन निहार जु रीझनहारी ।
चारु सिंदूर को लाल रसाल लसै व्रजवाल को भाल टिकारी ।
गोद में मानो विराजतु है घनश्याम के सारे कौ सारे कौ सारी ॥२६०॥