संपति सों सकुचाइ कुबेरहिं
संपति सों सकुचाइ कुबेरहिं रूप सों दीनी चुनौती अनंगहिं ।
भोग कै कै ललचाइ पुरंदर जोग कै गंग लई धरि मंगहिं ॥
ऐसे भए तो कहा रसखानि रसै रसना जो जु मुक्ति तरंगहिं ।
दै चित ताके न रंग रच्यो जु रह्यो रचि राधिका रानी के रंगहि ॥१०४॥
संपति सों सकुचाइ कुबेरहिं रूप सों दीनी चुनौती अनंगहिं ।
भोग कै कै ललचाइ पुरंदर जोग कै गंग लई धरि मंगहिं ॥
ऐसे भए तो कहा रसखानि रसै रसना जो जु मुक्ति तरंगहिं ।
दै चित ताके न रंग रच्यो जु रह्यो रचि राधिका रानी के रंगहि ॥१०४॥